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1/4/2017 12:00:00 AM

प्रधानमंत्री री-पैकेज मंत्री बन चुके हैं




31 दिसंबर को जब मोदी जी ने राष्ट्र को संबोधित किया तो लोग ये जानना चाहते थे कि पिछले 50 दिनों में जो दर्द लोगों ने झेला क्या उसका कोई फायदा मिला, क्या नोटबंदी से बेकार हुई 14.86 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा के बड़े हिस्से को काले धन वालों ने जला दिया या फिर गंगा में बहा दिया। लोग प्रधान मंत्री जी से सुनना चाहते थे कि - कल से कोई लाईन नहीं लगेगी।
 
लेकिन, न तो प्रधानमंत्री ने कोई राहत दी न ही उन्होंने इस बात का कोई आंकड़ा बताया कि सिस्टम में से कितना काला धन पकड़ा गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रचार के लालच में डूबी सरकार के लिये सच्चाई कहना बेहद शर्मनाक होता। इसके बजाय उन्होंने यूपीए सरकार की योजनाओं को लिया, जो पहले से ही चल रही थीं, और नये साल के तोहफे के तौर पर लोगों के सामने फिर से परोस दिया।
 
31 दिसंबर के भाषण में हड़बड़ाहट में की गयी घोषणाएं सिर्फ कांग्रेस की नीतियों का दोहराव था। मोदी जी ने गाजे-बाजे से लोगों को बताया कि जो गर्भवती महिला संस्थागत प्रसव करायेगी उसके बैंक खाते में 6,000 रुपये दिये जायेंगे। ऐसा लगता है मोदी जी को किसी ने ये नहीं बताया कि ये योजना 2013 से इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना के तहत पहले से ही चल रही थी।
 
इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि उनकी सरकार ने इसके लिये बजट में केवल 400 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। यदि वास्तव में वे सभी महिलाओं की मदद करना चाहते हैं तो इसके लिये करीब 15,000 करोड़ रुपये की धनराशि वहन करनी होगी। इससे ज्यादा भयावह सच्चाई, जिसे वो चाहते हैं कि लोगों को पता ही न चले, ये है कि उनकी सरकार ने पिछले 30 महीनों से गर्भवती महिलाओं को एक रुपया नहीं दिया है।
 
पीएम का एक और जुमला किसान क्रेडिट कार्ड के बारे में था। 31 दिसंबर को जो उन्होंने वादा किया उसके उलट, रुपे और किसान क्रेडिट कार्ड व अन्य डेबिट कार्ड का प्रावधान वर्ष 2012 के बाद से चल रहा है।
 
‘पुरानी बोतल में नयी शराब’ वाली कहावत की तर्ज पर एक और मामला प्रधान मंत्री आवास योजना से जुड़ा हुआ है जो सिर्फ इंदिरा आवास योजना का संशोधित संस्करण है, जिसका श्रेय लूटने की कोशिश की जा रही है।
 
मोदी सरकार मौलिकता और दक्षता के काबिल नहीं है। ज्यादातर योजनाएं जिन्हें वे अपनी उपलब्धि बताते हैं वो केवल यूपीए सरकार की योजनाओं और नीतियों का नाम बदल कर पेश की गयी हैं। शासन चलाने में उनकी नाकामी नोटबंदी के बुरे हश्र के तौर पर लोगों के सामने है, जिसने भारत के लोगों पर गहरी चोट की और 115 ईमानदार भारतीयों की जान ले ली।

 
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