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1/6/2017 12:00:00 AM

समय से पहले बजट पेश करने का सरकार का फैसला चुनाव आयोग की ‘आदर्श आचार संहिता’ का उल्लंघन है



8 नवंबर को सत्ता के मद में चूर प्रधानमंत्री मोदी ने 500 रुपये और 1000 रुपये के सारे नोटों को खत्म करने का फैसला किया। भाजपा के दुष्प्रचारकों और चापलूसों की फौज तक खुद को सीमित करने के बाद, प्रधानमंत्री मोदी इसके प्रभाव और जनता के मूड का अनुमान लगाने में नाकाम रहे। जैसे-जैसे दिन बीते उनको समझ में आने लगा कि आम लोगों को अथाह परेशानियां उठानी पड़ रही हैं और लोगों को साफ दिखने लगा कि नोटबंदी काले धन के खिलाफ लड़ाई नहीं बल्कि इससे भारत के केवल 1 फीसदी सुपर अमीरों को फायदा पहुंचाने की कोशिश हुई है। 

5 चुनावी राज्यों में संभावित राजनीतिक फायदा उठाने के लालच में मोदी सरकार ने अब केन्द्रीय बजट को एक महीने पहले - जनवरी के अंत में ही पेश करने का फैसला कर लिया जिसे आम तौर पर फरवरी के अंत तक पेश किया जाता रहा है। विभिन्न राज्यों में मतदान शुरु होने के ठीक पहले ही ऐसा किया जायेगा। 

मोदी सरकार ऐसा केंद्रीय बजट पेश करने जा रही है, जिसमें हम आशा करते हैं कि चुनावों को प्रभावित करने के लिये लम्बे-चौड़े वादे होंगे, लेकिन यदि इतिहास को याद रखें तो मिलने के नाम पर कोरे वादे ही होंगे। नैतिकता के नाम पर यह आदर्श आचार संहिता का घोर उल्लंघन होगा। मतदान से ठीक पहले केंद्रीय बजट पेश करना ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ की सोच के विपरीत होगा। 

एक संवाददाता सम्मेलन में भाजपा ढीठ बच्चे की तरह कांग्रेस पार्टी और विपक्ष के खिलाफ शिकायत कर रही थी। जाहिर है, भाजपा विपक्ष द्वारा नोटबंदी के कारण हुई मौतों, भ्रष्टाचार, आर्थिक नुकसान के मुद्दों को उठाने से परेशान है। इससे पहले कभी भी ऐसा नहीं देखा गया कि सरकार विपक्ष से इतनी डरी हुई हो और बहस करने की बजाय कीचड़ उछालने में जुटी हो। विभिन्न राज्यों में चुनाव से कुछ ही दिन पहले केंद्रीय बजट पेश करने के स्वाभाविक अनैतिक निर्णय के खिलाफ अब हम आलोचनाओं की आवाज़ उठा रहे हैं तो भाजपा एक बार फिर से उत्तेजित और घबराहट में दिख रही है।

 
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