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चर्चा में

8/8/2017 12:00:00 AM

हम या तो भारत को आज़ाद करेंगे या आज़ादी की कोशिश में प्राण दे देंगे



8 अगस्त, 1942 को बम्बई में एआईसीसी के समक्ष महात्मा गांधी द्वारा दिये गये प्रसिद्ध भारत छोड़ो भाषण के अंश

सत्याग्रह में धोखे, जालसाजी या किसी प्रकार के झूठ के लिये जगह नहीं है। धोखा और झूठ आज दुनिया पर छा गये हैं। मैं ऐसी स्थिति को चुपचाप बैठा देख नहीं सकता। मैं सारे भारत में इतना अधिक घूमा-फिरा हूं जितना कि वर्तमान युग में शायद कोई भी नहीं घूमा-फिरा होगा। देश के करोड़ों बेजबान लोगों ने मुझे अपना मित्र और प्रतिनिधि पाया औ मैं भी उनसे मिलकर उस हद तक एक हो गया जिस हद तक कि किसी मनुष्य के लिये ऐसा करना संभव है। मैंने देखा कि वे मुझ पर विश्वास करते हैं और अब मैं झूठ और हिंसा पर खड़े इस साम्राज्य का मुकाबला करने के लिये उनके विश्वास का उपयोग करना चाहता हूं। साम्राज्य ने चाहिे कितनी ही लम्बी-चौड़ी तैयारियां क्यों न कर रखी हों, हमें उसके शिकंजे से निकलना है। यह कैसे हो सकता है कि मैं इस महत्त्वपूर्ण घड़ी में चुप बैठा रहूं और सही रास्ता न दिखाऊं? क्या मैं जापानियों से कहूं कि भाई, जरा रुक जाओ? अगर आज में चुपचाप निष्क्रिय बैठा रहूं तो ईश्वर मुझे फटकार देगा कि जब सारी दुनिया में आग फैल रही थी तब मैंने उसके दिये खजाने का उपयोग क्यों नहीं किया। यदि स्थिति कुछ और होती तो मैं आपसे थोड़ा इंतजार करने को कहता। लेकिन अब स्थिति असह्य हो गई है और कांग्रेस के लिए कोई और रास्ता नहीं रह गया है।

फिर भी वास्तविक संघर्ष इस क्षण नहीं शुरु हो रहा है। आपने अपने सारे अधिकार मुझे सौंप दिये हैं। अब मैं वाइसराय से भेंट करने जाऊंगा और उनसे कांग्रेस की मांग स्वीकार करने का अनुरोध करुंगा। इस काम में दो-तीन सप्ताह लग जाने की संभावना है। इस बीच आप क्या करेंगे? इस अवधि के लिये क्या कार्यक्रम है, जिसमें सब हिस्सा ले सकते हैं? जैसा कि आप जानते हैं, मुझे सबसे पहले चरखे का ख्याल आता है। मैंने मौलाना साहब को भी यही जवाब दिया था। वे चरखे की बात नहीं मानते थे, हालांकि बाद में इसका महत्त्व उनकी समझ में आ गया। चौदह सूत्री रचनात्मक कार्यक्रम तो आपके सामने है ही, जिसपर कि आप अमल कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त आपको क्या करना होगा? मैं आपको बताता हूं। आपमें से हर स्त्री-पुरुष को इस क्षण से अपने को आज़ाद समझना चाहिए और यों आचरण करना चाहिए मानो आप आज़ाद हैं और इस साम्राज्यवाद के शिकंजे से छूट गये हैं।

मैं आपसे जो-कुछ कह रहा हूं उसका मतलब अपने आपको धोखा देना नहीं है। यह तो स्वतंत्रता का सार है। गुलाम की बेड़ियां उसी क्षण टूट जाती हैं जब वह अपने आपको आज़ाद समझने लगता है। तब वह अपने मालिक से साफ कहेगा - ‘इस क्ष्ण तक तो मैं आपका गुलाम था लेकिन अब मैं गुलाम नहीं रहा। अगर आप चाहें तो मुझे मार सकते हैं, लेकिन अगर आ मुझे जिंदा रहने दें तो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि अगर आप अपनी मर्जी से मुझे बंधन मुक्त कर दें तो मैं आपसे और कुछ नहीं मांगूंगा। आप मुझे रोटी कपड़ा देते रहें थे, हालांकि मैं खुद अपनी मेहनत से रोटी-कपड़े का प्रबंध कर सकता था। अब तक तो मैं भोजन-वस्त्र के लिए ईश्वर के भरोसे रहने की बजाय आपके भरोसे रहता था। लेकिन अब भगवान ने मेरे अंदर आज़ादी की अभिलाषा पेदा कर दी है। आज मैं आज़ाद आदमी हूं और आगे से आपके भरोसे नहीं रहूंगा।

आप विश्वास रखिए कि मैं मंत्रिपद आदि के लिए वाइसराय से कोई सौदा करने वाला नहीं हूं। मैं पूर्ण स्वतंत्रता के सिवाय किसी चीज से संतुष्ट होने वाला भी नहीं। हो सकता है कि नमक कर को हटाने, शराब की लत को खत्म करने आदि के बारे में सुझाव रखूं। लेकिन मैं कहूंगा कि ‘स्वतंत्रता के सिवाय कुछ भी नहीं।’

यह एक छोटा सा मंत्र मैं आपको देता हूं। आप इसे अपने हृदय पटल पर अंकित कर लीजिए और हर श्वास के साथ उसका जाप किया कीजिए। वह मंत्र है - ‘करो या मरो।’ या तो हम भारत को आज़ाद करेंगे या आज़ादी की कोशिश में प्राण दे देंगे। हम अपनी आंखों से अपने देश्ज्ञ का सदा गुलाम और परतंत्र बना रहना नहीं देखेंगे। प्रत्येक सच्चा कांग्रेसी, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, इस दृढ़ निश्चय से संघर्ष में शामिल होगा कि वह देश को बंधन और दासता में बने रहने को देखने के लिए जिन्दा नहीं रहेगा। ऐसा आपका संकल्प होना चाहिए।

 
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