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Highlights of the press briefing of Dr. Abhishek Manu Singhvi, MP and Spokesperson 12-05-2017

Created on Friday, May 12, 2017 12:00 AM

https://www.youtube.com/watch?v=in1Njts7LXU

Dr. Singhvi said it is quite astonishing the amount of misinformation and distortion which has been going on since today forenoon in regard to the court proceedings of Young Indian / National Herald. I sometimes wonder if the Government does not have better things to do or focus on governance in this country than to circulate unsigned notes of briefing to all of you which are actually campaigns of misinformation and distortion.


We have one such note which is the government's version of what happened regarding the judicial challenge in the Income Tax matter of Young Indian. It is a very sorry sad state to find the government agencies by proxy through anonymity deliberately engaging in incomplete, partial, distorted, slanted misinformation possibly bordering on Contempt of Court because it is deliberately distorting court orders passed in our presence – my presence because I happen to be the Counsel arguing the matter. This shows the unambiguous, clear insecurity and vindictive approach. 


 Let me explain to you why I say this. A notice is issued to Young Indian supposedly for reopening assessment of six years ago suddenly when no Income Tax proceedings are pending. Suddenly a Notice is sent in 2014 immediately after this Government comes, reopening proceedings six years older. The Notice is based on two queries about a Company. To cut a long story short, we go to the Writ Court today– after we get reasons from the Department and our principal ground in the Writ Court today was that the Department had no jurisdiction to issue this Notice and has no jurisdiction to reopening proceedings because as per the statute the Department has "No reason to believe' which is essential precondition to reopen proceedings. I hope you are clear till now. 


Now the Order in the course of proceedings in the Hon'ble High Court observes today – I happen to argue it – that all the points which we raised in the Writ in the Hon'ble High court can be raised by Young Indian before the Department including the point that the Department had no reason to believe to reopen. So the Court put to us that you can raise all the points you have raised before us before the Department as well and they recorded my statement and expressly gave me liberty in the judicial order that all points raised by me in the Writ in the Hon'ble High Court can be raised in the Department including the jurisdictional point that the department had no reason to believe to issue the reopening Notice. 


 In view of the matter, because of that, I withdrew the Writ. Now this is a specific order, is this what you have been told, and is this what you are reporting? The unsigned note circulated by terrified Government proxies who have nothing else to do is using all adjectives - somebody is saying that this is the direction issued by the Court today - the Department has been directed to investigate. We will apologize to you if the order shows this. Is it not contempt of court? Some of you are told to publish that the order says Smt. Sonia Gandhi and Shri Rahul Gandhi have been asked to appear. This is all Government agencies are doing, feeding the press misinformation when our grievance is known to all, I have kept it open to be raised there in the IT Department including my grievance that jurisdictionally the Department had no reason to believe to issue the Notice in the first place. Then why should I argue for it in the Writ Court. That is the black and white order. Now from where did you get all this that the Court has directed to do this and that and Mr. so and so should appear? Is this fair reporting, is this fair for the Government agencies. 


We are proud to be associated with the National Herald. We are proud to be associated with the Newspaper which in the pre-independence era stood up for free speech when the Britishers were tightening and throttling free speech very similar to present day climate. National Herald stood up for certain ideals and we fully support with pride this initiative. I am now not talking of today's case but we have already dealt with it from this podium for reminding you. Has anybody benefitted financially from this? Section 25, 'Not for Profit' Company the Act prohibits paying out dividend, prohibits the giving of pecuniary perks etc. Who has gained financially? It is a Section 25 Company. No financial gain is possible. Has there been any asset transfer – none. Can a political party receive or give loans , provision says yes. Is it a real estate company, is a somebody's fertile imagination to think so. These are properties owned by this Company for decades. And who can benefit, it will remain property of 'Not for Profit Section 25 Company'. 


 Yes, we understand that the ruling party wants to indulge in this campaign of misinformation only because either they want to supply information to their proxies who are fighting us in Court or they do not want to go by the facts because they are scared of the fact. 


डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि ये एक बहुत दुखद प्रसंग इसलिए है कि सरकार के पास कुछ महत्वपूर्ण काम करने का समय, जरुरत या इरादा नहीं है। आज दिनभर से मुझे अच्छंभा हो रहा है, सुबह से सरकार की प्रोक्सी, सरकार के ऐजेंट आपको सबको अनसाईंड़ नोट सर्क्यूलेट कर रहे हैं, हमारे पास भी हैं वो नोटस, जिसमें कि अजीबो-गरीब असत्य, गलत, झूठी समरी बनाई गई है कि आज कोर्ट में क्या हुआ। मैं समझता हूं कि इससे उनका भय, बौखलाहट दिखता है।  अटकलें, आरोप लगाए जा रहे हैं। जो कहा जा रहा है आपको वो उच्च न्यायालय के लिखित आदेश के विरुद्ध है। लेकिन आदेश से ना आप दूर भाग सकते हैं ना मैं। मैंने इसकी जिरह की है। इसलिए मैं आपको संक्षेप में इसका संदर्भ समझा दूं और अपने आप निर्णय ले लीजिएगा कि जो आपको बताया जा रहा है जानबूझ कर गलत छापने के लिए, विकृत छापने के लिए ऐजेंटों का इस्तेमाल करके, वो सही है या गलत है? एक गौरवशाली भारत में स्वतंत्र सोच, शब्दों को मीडिया प्रकाशित करें, ये संतुलन इस सरकार के पास नहीं है। 


इस सरकार के आने के बाद, 2014 के बाद IT डिपार्टमेंट एक नोटिस देता है 6 वर्ष के पुराने असेस्मेंट को पुन: वापस खोलने के लिए। उसके दो कारण देता है, उसका जवाब जो भी होता है लेकिन आज की बात अगर संक्षेप में कहनी हो तो जब डिपार्टमेंट से चिट्ठी आ जाती है तो हम एक याचिका देते हैं, उच्च न्यायालय में। हमारा प्रमुख बेसिस उस याचिका में है कि डिपार्टमेंट के पास कोई भी Reason to believe नहीं था। Reason to believeएक कानूनी फ्रेज है जो अतिआवश्यक है, किसी नोटिस द्वारा पुराने वर्षों का किसी भी व्यक्ति का असेस्मेंट खोलने के लिए। तो हम याचिका में कहते हैं कि Reason to believe नहीं है डिपार्टमेंट के पास इसलिए कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है कि 5-6 वर्ष पुराना असेस्मेंट खोलें। उच्च न्यायालय ने काफी समय तक उस मामले को सुना और ओपन कोर्ट में कहा कि आप याचक हैं, जो-जो आपको आपत्तियाँ हैं, हर आपत्ति को हम आपको छूट देते हैं कि आप वापस जाकर डिपार्टमेंट के सामने दोहरा सकते हैं और डिपार्टमेंट बाध्य होगा कानून के अनुसार निर्णय लेने का। 


उसके बाद उच्च न्यायालय और स्पष्टीकरण देता है कि आप पुन: डिपार्टमेंट के पास जाकर अपनी सभी दलीलों को दोहरा सकते हैं, उसमें ये भी शामिल है कि आप डिपार्टमेंट को ये बता सकते हैं कि क्यों ये नोटिस जब तक Reason to believe नहीं हो, तब तक नहीं दिया जा सकता और क्यों इस केस में Reason to believe नहीं है। जब हमारी हर दलील को खुला रखा गया है, जब हमारी हर आपत्ति को पुन: वापस डिपार्टमेंट के सामने दलील के लिए छोड़ दिया गया। उसके बाद ऑर्ड़र में लिखित रुप से स्पष्ट शब्दों से कहा गया है कि हम ये लिबर्टी लेते हैं। तो हम क्यों बहस करें उच्च न्यायालय के सामने? इसलिए हमने Constitutionally याचिका को withdraw किया है। आपको सिखाया-पढ़ाया जा रहा है बच्चों की तरह, लुके-छीपे टिप्स दिए जा रहे हैं कि उच्च न्यायालय ने कहा कि डिपार्टमेंट जांच करो। 3 घंटे पहले का ऑर्डर निकाल लीजिए। कहाँ लिखा है ये, अगर लिखा है तो हम आपसे माफी मांगेंगे।  


क्या कि संतुलित सरकार का ये काम है कि इस प्रकार के बिना हस्ताक्षर के गलत, फरेबी, विकृत नोटिस द्वारा आपको बरगलाएं। कौन से नोट में लिखा है सोनिया गाँधी जी आप पेश हों, राहुल गाँधी जी आप पेश हों या अन्य कोई पेश हो, हमने तो नहीं सुना, मैं खुद वहाँ पर था कोर्ट में। 


हमने याचिका दी कि IT डिपार्टमेंट का अधिकार क्षेत्र नहीं है बिना Reason to believe पुराने 6 वर्ष के असेस्मेंट को खोलने का। उच्च न्यायालय ने डिटेल में सुनने के बाद ये होल्ड किया कि ये जो आप हमारे सामने आकर आपत्ति दर्ज कर रहे हैं, ये आप वहाँ जाकर कर सकते हैं। फिर स्पष्ट रुप से 8 लाईनों में लिख कर दिया कि आपको सिर्फ ये स्वतंत्रता नहीं है कि आप वापस जा सकते हैं और हर वो आपत्ति जो यहाँ लिखी है हमारे सामने, वो वहाँ भी रेज कर सकते हैं। including Reason to believe/ कि Reason to believe नहीं होने पर आप नोटिस जारी नहीं कर सकते इस मुद्दे को भी आप वहाँ रेज कर सकते हैं। ये अधिकार क्षेत्र का मुद्दा है। ज्यूडिशरी का मुद्दा है। इस कारण से, इस आधार पर, इस रिकोर्डिंग के बाद, इस लिबर्टी के बाद, कानून में इसे लिबर्टी कहते हैं, स्वतंत्रता के बाद जो लिखा है उसमें हमने याचिका withdraw की और मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ये देखकर कि 5 घंटे तक सरकार के पास कोई काम नहीं था, सब काम बंद हो गए। सिर्फ एक काम चल रहा है कि किस प्रकार से आप सब लोगों को बरगलाया जाए,जिसका सच से कोई सरोकार नहीं है। 


मैं ये भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि कांग्रेस बहुत गौरव महसूस करती है कि नेशनल हैराल्ड जैसे अखबार के साथ कांग्रेस का नाम जुड़ा है और कांग्रेस के साथ नेशनल हैराल्ड का नाम जुड़ा है। ये स्वतंत्रता से पहले का अखबार है। जिस वक्त हमारे सोचने की, बोलने की, अभिव्यक्ति करने की,मानवाधिकार का हनन और कुचलना ब्रिटिश सरकार कर रही थी, आज बहुत हद तक आज उस जैसा वातावरण ही है। उस वक्त भी तीव्रता से, जोश और हौसले से नेशनल हैराल्ड ने अपनी आवाज उठाई थी और उसी तरह से कांग्रेस पार्टी आज भी अपनी आवाज उठाती रहेगी।

 
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